सरदारशहर एक्सप्रेस / मनीष पांडिया। जब ज्येष्ठ और आषाढ़ के महीनों में सूर्यदेव अपने पूरे तेवर में होते हैं और थार के रेगिस्तान में 45 से 48 डिग्री सेल्सियस की तपिश के साथ लू के थपेड़े चलते हैं, तब आधुनिक सुख-सुविधाएं और महंगे विदेशी ब्रांड्स के शीतल पेय भी बेअसर साबित होने लगते हैं। ऐसी भीषण परिस्थितियों में भी राजस्थान का आम जनमानस, किसान और मजदूर वर्ग पूरी ऊर्जा के साथ खेतों और कार्यस्थलों पर डटा रहता है। इस अदम्य साहस और शारीरिक क्षमता के पीछे सदियों पुराना एक मरुस्थलीय अचूक कवच है—’राबड़ी’। राबड़ी सिर्फ एक पेय या भोजन नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की जीवनशैली का हिस्सा, एक बेहतरीन ‘नेचुरल कूलेंट’ और मरुधरा का असली ‘अमृत’ है।
आज की पीढ़ी भले ही पैक्ड और प्रिजर्वेटिव युक्त डिब्बाबंद जूस या कोल्ड-ड्रिंक्स को आधुनिकता का प्रतीक मानती हो, लेकिन राबड़ी के निर्माण की प्रक्रिया को देखें तो समझ आता है कि हमारे पूर्वजों का खान-पान कितना वैज्ञानिक था।
आमतौर पर राबड़ी दो प्रकार से बनाई जाती है—बाजरे की राबड़ी (जो सर्दियों के अंत और गर्मियों की शुरुआत में चाव से खाई जाती है) और जौ की राबड़ी (जो विशेषकर तेज गर्मियों में पेट को ठंडक देती है)।
इसकी तैयारी एक दिन पहले ही शुरू हो जाती है। मिट्टी की हांडी में छाछ के साथ जौ या बाजरे के आटे को मिलाकर धूप में या रातभर खमीर उठने के लिए रख दिया जाता है। अगले दिन इसे धीमी आंच पर पकाया जाता है। ठंडी होने के बाद, सुबह के समय इसमें पुनः ठंडी छाछ, भुना हुआ जीरा और सेंधा नमक मिलाकर कांसे के थाल या मिट्टी के कुल्हड़ में परोसा जाता है।
आधुनिक पोषण विज्ञान आज ‘प्रोबायोटिक्स’ और ‘फर्मेंटेड फूड’ के फायदों पर रिसर्च कर रहा है, जबकि राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में यह सदियों से रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा है। रातभर छाछ और अनाज के मिश्रण को रखने से उसमें गुड बैक्टीरिया पनपते हैं, जो हमारे पाचन तंत्र के लिए वरदान हैं। यह पेट में एसिडिटी, गैस और कब्ज जैसी समस्याओं को समूल नष्ट करती है।
कहावत है कि “सुबह राबड़ी रो गटका लगाय ले, पछै लू थारो कांई बिगाड़सी” यानी सुबह एक गिलास राबड़ी पीकर निकलने वाले व्यक्ति को लू छू भी नहीं सकतीं।
तेज गर्मी में पसीने के माध्यम से शरीर से नमक और जरूरी मिनरल्स बाहर निकल जाते हैं। राबड़ी में मौजूद छाछ, पानी और नमक शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स के स्तर को तुरंत संतुलित करते हैं और डिहाइड्रेशन से बचाते हैं।
जौ और बाजरा कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट के बेहतरीन स्रोत हैं। इन्हें पचाने में शरीर को समय लगता है, जिससे ग्लूकोज धीरे-धीरे रिलीज होता है। यही कारण है कि सुबह एक बड़ा गिलास राबड़ी पीने के बाद दोपहर तक न तो भूख लगती है और न ही शरीर में थकावट महसूस होती है।
जहाँ बाजार के महंगे सप्लीमेंट्स और ग्लूकोज पाउडर आम आदमी की जेब पर भारी पड़ते हैं, वहीं राबड़ी बेहद कम लागत में हर घर में तैयार होने वाला सर्वोत्तम ‘एनर्जी ड्रिंक’ है।
समय के साथ राबड़ी के स्वरूप में भी सकारात्मक बदलाव आए हैं। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग अब इसमें जौ और बाजरे के साथ-साथ ज्वार या रागी का आटा भी मिलाने लगे हैं, जिससे इसकी पौष्टिकता कई गुना बढ़ जाती है। शहरों के बड़े होटलों और पारंपरिक उत्सवों में अब इसे ‘राजस्थानी वेलकम ड्रिंक’ के रूप में मिट्टी के कुल्हड़ों में बड़े चाव से परोसा जाने लगा है, जो इसकी बढ़ती लोकप्रियता का प्रमाण है।
आज पश्चिमी देशों के ‘कार्बोनेटेड ड्रिंक्स’ और सिंथेटिक फ्लेवर्स ने हमारी युवा पीढ़ी के स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाया है।
मोटापा, डायबिटीज और कमजोर इम्युनिटी जैसी बीमारियां कम उम्र में ही पैर पसार रही हैं। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी पारंपरिक विरासत की महत्ता को समझें।
राबड़ी सिर्फ ग्रामीण परिवेश की वस्तु नहीं, बल्कि उत्तम स्वास्थ्य की कुंजी है। स्थानीय खान-पान को बढ़ावा देना न केवल स्वास्थ्य के लिहाज से जरूरी है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखने का भी माध्यम है। इस चिलचिलाती गर्मी में विदेशी और कृत्रिम पेयों को अलविदा कहकर, अपनी माटी की सौंधी खुशबू से महकती पौष्टिक राबड़ी को अपनाएं और स्वस्थ भारत के निर्माण में भागीदार बनें।
लेखक परिचय– मूलतः सरदारशहर (चूरू) के निवासी गुरु धानका एक सजग सामाजिक कार्यकर्ता, स्तंभकार और डिजिटल मीडिया रणनीतिकार हैं। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र (जीएनएम) की पृष्ठभूमि रखने के साथ-साथ आप ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण और राजस्थानी भाषा व संस्कृति के उत्थान के लिए जमीनी स्तर पर सक्रिय हैं। समसामयिक और सांस्कृतिक विषयों पर इनके विचार और आलेख विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं।







